ज़रा संभल के

जहन में न सही नज़र में रखो
हम धूप के पंछी हैं हमें न शजर (छाँव) में रखो

हमने तो उम्र भर बहुत दोस्त कमाए हैं, दुश्मन भी
तुम ये वसीयत, ये दौलतें अपनी कब्र में रखो

हम अंधेरों के जुगनू हैं, और वो भी दिलजले
तुम ये सारे आफ़ताब (चाँद) अपने घर में रखो

सब्र में तो उम्र पूरी कट गयी हमारी
तुम हमारा नाम अब बेसब्र में रखो

भरोसा एक बर्फीली सड़क है, याद रहे
नीयत के पाँव ज़रा संभल के रखो

पियूष कौशल

Feed the hungry blog: Share the care
0

दोस्त

अभी गरीब हुं इसलिए दोस्त हैं मेरे
अमीर होता तो रिश्तेदार होते़़़

पियुष कौशल

Feed the hungry blog: Share the care
0

आंच

तुम भी चढ़ाकर देखो अपने से किसी रिश्ते को
मतलब की आंच पर,
हमने अच्छे अच्छों को वहां रंग बदलते देखा है…

                                                               पियूष कौशल

Feed the hungry blog: Share the care
0

गहरा कोहरा है

गहरा कोहरा है
नुक्कड़ वाले मोड़ पर आज भी बैठी है वो बुढ़िया,
खाली आँखों से आसमान टटोलती
हाथों में उसके लकीरे न होंगी शायद
चेहरे पर ही वक़्त ने जैसे नक़्क़ाशी जड़ दी हो
उस चाबी वाले गुड्डे मे चाबी भर मुस्कुराती
दिवाली पर दिलवाया था उसे, बड़ा खुश हुआ था
मेरी अच्छी माँ कहकर खूब ज़ोर से गले लगाया था
वक़्त चाबी भरना भूल गया शायद
वो चलते चलते रुक गया
न कदम उठा न हाथ बढ़ा – अँधेरा हुआ था तब
आज कोहरा है, गहरा कोहरा है

पियूष कौशल (शिव)

Feed the hungry blog: Share the care
0

कहानी

आज आँखों से बह गयी वो कहानी
जिसे कुछ सदियों से छुपाये हुए था

यूँ कौनसी शाम गुज़री उस रात की गोद मे
रो पड़ा वो ज़ख्म जिसे बरसों से बहलाये हुए था

अब हर सुबह लगती है वो ख्वाब की जिसमे
चाँद सूरज को गले लगाए हुए था

उसकी आँखों से बहती थी बहुत ग़ज़लें
शायद किसी शायर से दिल लगाए हुए था

Feed the hungry blog: Share the care
0

Loan

मुझपर लोन हैं ज़िन्दगी का,
EMI ख्वाहिशों की मीलों की कतार में है
हर नए रिश्ते, नए त्यौहार से
मेरी जेबों में छाले पड़ते हैं
इंसान को अच्छा नहीं महँगा लगना चाहिए
समझ आ गया है अब
बालों में चांदी है सफ़ेद
रातों से सोना गायब है
क़र्ज़ जीने का चुकाता हूँ ,
मुझपर लोन है ज़िन्दगी का

Feed the hungry blog: Share the care
0