मुलाकात

कुछ ऐसे शय और मात हो गई
इक रोज़ उनसे जो मुलाकात हो गई

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#differently abled

स्टापू खेलते खेलते मस्ती में छपाक से
हड़काते लुढ़काते वक़्त ठेल दिया हमने
दो पैरों वाले को मगर जिन्दगी बोझ लगती है

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पर्दा

वक़्त के साथ हथेली पर चढ़ गया है एक सफ़ेद पर्दा
दिन रात खुद से आंखें बचाकर इस पर उंगलियां घुमाता हूँ
मानो कोई जादू ही है, ये रहा शर्मा और वो अख्तर…
मिलाता सबसे है पर मिलने किसी से नहीं देता
वो जो किस्से कहानियां होती थी हर शाम सुनने सुनाने को
आजकल बड़ी जल्दी में रहती है, टाइम लाइन से होकर बड़ी तपाक से गुजर जाती है
बुआ, चाचा, मामा सब यहीं हैं इन हाथों में – ऐंठे से मुस्कुराते अपनी फोटो से
यादें मगर कुछ गमगीन नज़र आती हैं
इस सफ़ेद परदे की काली करतूतें रंगीन नज़र आती हैं

पियूष कौशल

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दोस्त

अभी गरीब हुं इसलिए दोस्त हैं मेरे
अमीर होता तो रिश्तेदार होते़़़

पियुष कौशल

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आंच

तुम भी चढ़ाकर देखो अपने से किसी रिश्ते को
मतलब की आंच पर,
हमने अच्छे अच्छों को वहां रंग बदलते देखा है…

                                                               पियूष कौशल

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