वाह रे उपरवाले

पंडित पादरी मौलवी कर रहे धर्म प्रचार
चोर लूटेरे सेवक हैं, नेता पहरेदार
सब जेबें भरन लगे, नोट भयो भरमार
वाह रे उपरवाले तेरी महिमा अपरम पार

पियूष कौशल

आंच

तुम भी चढ़ाकर देखो अपने से किसी रिश्ते को
मतलब की आंच पर,
हमने अच्छे अच्छों को वहां रंग बदलते देखा है…

                                                               पियूष कौशल

सुबह

सुबह की पहली किरण ने मेरी आँखें टटोली
कुछ अधूरे सपने अभी भी पलकों पे सो रहे थे
मेरी आँखों ने झूमते हुए बिस्तर को संभाला
उस सिराहने पर ही शायद कोई बादल बरसा था
वो चादर की सलवटें मेरे ख्यालों से रूबरू थीं
कुछ उलझी सी, बेदार सी, बेशर्म सी
आईने में दिख रहा था शख्स वो
वक़्त जिसके बालों में चांदी मल गया था
फिर सोचा यूँ की आज यादों में नहायेंगे जी भर के
वो बक्से जो बंद है सदियों से उनको भी रिहाई देंगे
अपनी आँखों में रख लेंगे मखमल से वो लम्हे
जिन लम्हों की छाँव में आज भी जिंदगी आसान हो जाती है
इक चाय की प्याली तब मेरी नींदों को दस्तक दी
लो मुर्दों का ये काफिला आज फिर से दफ्तर चल दिया

गहरा कोहरा है

गहरा कोहरा है
नुक्कड़ वाले मोड़ पर आज भी बैठी है वो बुढ़िया,
खाली आँखों से आसमान टटोलती
हाथों में उसके लकीरे न होंगी शायद
चेहरे पर ही वक़्त ने जैसे नक़्क़ाशी जड़ दी हो
उस चाबी वाले गुड्डे मे चाबी भर मुस्कुराती
दिवाली पर दिलवाया था उसे, बड़ा खुश हुआ था
मेरी अच्छी माँ कहकर खूब ज़ोर से गले लगाया था
वक़्त चाबी भरना भूल गया शायद
वो चलते चलते रुक गया
न कदम उठा न हाथ बढ़ा – अँधेरा हुआ था तब
आज कोहरा है, गहरा कोहरा है

पियूष कौशल (शिव)

Ahistaa Ahistaa….

ज़िन्दगी से जो चमक ली थी उधार लड़खपन में
लौटा रहा हूँ अब वापिस, आहिस्ता आहिस्ता

सूरज मिलता नहीं मुझसे अब बहुत दिन हुए
रात करवटों में गुज़र जाती है अक्सर, आहिस्ता आहिस्ता

गया वो दौर की रिश्ते सँभालने, पिरोने पड़ते थे
आसान किश्तों में अब बिकता है प्यार, आहिस्ता आहिस्ता

बस कुछ झूठ हैं मेरे जो अब फल फूल रहे हैं
सच तो सारे दम तोड़ चुके हैं यहां,आहिस्ता आहिस्ता